सिंदबाद ट्रैवल्स जर्मनी काँच के लिए नए रंगों की खोज जर्मनी में

सिंदबाद ट्रैवल्स
जर्मनी
काँच के लिए नए रंगों की खोज जर्मनी में

1997 के एम्बिएंटे फेयर में जब मैं गया तो हॉफ इम्पोर्टर्स के स्टैंड पर मैंने मेटालिक चमक के कटोरे,ग्लास आदि चीजें देखीं जो बहुत आकर्षक लग रही थीं।मैंने पास जाकर देखा तो वो काँच था।अब तो मैं बहुत परेशान हो गया कि ये क्या चीज़ है और कैसे बनेगी पर कोई बताने वाला नहीं था।फेयर के तुरंत बाद शाम को मैं मार्केट गया और वहाँ काँच के सामान के स्टोर्स को तलाशना शुरू किया और आखिर में एक स्टोर पर जाकर मुझको मेटालिक फिनिश का एक ग्लास मिल गया।मैंने उनसे पूछा कि ये क्या है तो उनसे कोई जानकारी नहीं मिली लेकिन वो ग्लास मैंने खरीद लिया और फिर वहीं खड़े होकर उसका निरीक्षण किया।काफी देर कुछ समझ नहीं आया तभी उस दुकान के मालिक मेरे पास आये और उन्होंने मेरी समस्या पूछी तो मैंने कहा कि मैं खुद काँच बनाता हूँ पर ये मैटेलिक फिनिश कैसे है ये समझ नहीं पा रहा तो वो बोले ये शायद किसी किस्म का कलर है तो मुझको विश्वास नहीं हुआ क्योंकि एक तो हमारे फिरोजाबाद में काँच के बर्तन आदि चीजें या तो पॉट से रंगीन कलर के काँच की बनती थीं या फिर क्लियर ग्लास की।हमारे यहाँ ऐसे रंग नहीं होते थे जो काँच पर स्प्रे करें तो पक्के जमे रहें और फूड सेफ भी हों।मैंने अविश्वास के साथ वहीं पर उस ग्लास को चाबी से खुरच कर देखा और उनकी बात सही थी बहुत प्रयास करने पर एक जगह से रंग हटा और क्लीयर ग्लास दिखने लगा।अब तो मुझको वो रंग का सप्लायर चाहिए था किंतु वो कहाँ मिलेगा ये बताने वाला कोई नहीं था पर मैं भी कहाँ हार मानने वाला था।मैं सीधे फ्रैंकफर्ट स्टेशन गया वहाँ उस समय ऊपर जाने वाले जीने के बगल में एक लकड़ी के स्टैंड पर बहुत सारी यलो पेजेज डायरेक्टरी रखी रहती थीं और वो एक पतली रस्सी से बंधी रहती थीं कि उनको कोई ले न जा सके।तो वहीं एक तरफ सीढ़ी पर बैठ कर मैंने यलो पेजेज में ग्लास कलर्स के मैन्यूफैक्चररों की खोज शुरू की।कुछ नाम मिले तो उनको फोन किया आखिर मैं एक नए कहा कि हॉं वो ऐसे रंग बनाते हैं।मैंने उनसे पूछा कि अगले दिन से बाद के दिन जो शायद रविवार था मैं आ सकता हूँ तो उन्होंने कहा कि वैसे तो रविवार को फैक्ट्री बंद होगी फिर भी आप आइए मैं आपको रेलवे स्टेशन पर लेने आ जाऊँगा।
यह कम्पनी हिडेनहाउसेन (hiddenhausen) नामक स्थान पर थी जो फ्रैंकफर्ट से उत्तर में था।उस वक़्त इस स्थान पर रेलवे स्टेशन शायद नहीं था तो इसका निकटतम स्टेशन हुआ करता था हरफोर्ड Herford जहाँ जाने के लिए पहले मैं ट्रेन पकड़ कर फ्रैंकफर्ट से हैनोवर Hanover गया जो फ्रैंकफर्ट से लगभग 4 घंटे का सफर था और फिर हैनोवर से हरफोर्ड जो लगभग 90 किलोमीटर का लगभग 1 घंटे का सफर था।हरफोर्ड स्टेशन पर बिल्कुल सन्नाटा था लेकिन उस कम्पनी के मालिक मिस्टर पीटर मुझको लेने आये थे।हम उनके ऑफिस Hiddenhausen में गए जो हरफोर्ड से लगभग 8 किलोमीटर और 10-15 मिनट का रास्ता था।मिस्टर पीटर से बातचीत में पता चला कि कलर बनाने का उनका काम पुश्तैनी और पारिवारिक है और लगभग 3-4 पुश्तों से है।उनकी फैक्ट्री के बाहर की एक जो चीज मुझको बहुत अच्छी लगी और आज भी याद है वो थी गुलाब के फूलों की बेल।इस बेलनुमा पेड़ में बहुत सारे छोटे छोटे गुलाब के फूल,सर्द गीला सा मौसम हरफोर्ड के उस इलाके की सादगी भरी ख़ूबसूरती बयां कर रहे थे।मिस्टर पीटर से काफी अच्छी बातचीत हुई।उन्होंने बताया कि वो ग्लास के लिए भी कलर्स बनाते हैं और अभी एशिया में उनकी कोई रेगुलर सप्लाई नहीं है।उन्होंने मुझसे कहा कि वो रंगों के सैम्पल मुझको भेज देंगे।उनसे बात करके मैं फिर वापिस फ्रैंकफर्ट को चल दिया।
बाद में उनके  सैम्पल मुझ पर आए और आज 2023 में जब मैं यह संस्मरण लिख रहा हूँ तब भी मैं कह सकता हूँ कि मैंने ग्लास के जितने भी कलर यूज़ किये उनमें इस कम्पनी से बेहतर किसी का प्रोडक्ट नहीं है।बाद में उनका भारत में भी ऑफिस खुला जिसको श्री हर्ष अग्रवाल देखते हैं।हर्ष जी से मेरी एकाधिक बार की मुलाकात है,वो बहुत ही सज्जन व्यक्ति हैं और उन्होंने इस इलाके में  काम को बहुत बढ़ाया है।उस समय पीटर जी ने जो कलर मुझको भेजे तो हमने 1998 के फेयर में अपने प्रोडक्ट्स में उन रंगों का प्रयोग किया था और बहुत से अर्थों में भारत की काँच की दुनिया में वो भी एक नया और पहला कदम था।हमारा बूथ हॉल नम्बर 6 प्रगति मैदान में लगा था और इस नए फिनिश के कांच के प्रोडक्ट्स को देखने को एक तरह से स्टाल पर लाइन सी लग गयी थी किंतु हमने बाद में इस बात को महसूस किया कि वो समय से आगे का कदम था और उस समय यूरोप का ग्राहक उस किस्म के हाई-ऐंड माल को इटली आदि से ही लेना पसंद कर रहा था तथा भारत से लेने को तैयार नहीं था।हम लोगों ने इससे पहले क्रिसमस ऑर्नामेंट्स को स्प्रे पेंट से रंग कर भेजना शुरू कर दिया था और भारत के लिए यह भी एक नई बात थी क्योंकि इस से पहले रंगीन क्रिसमस ऑर्नामेंट्स पॉट के रंगीन काँच से ही बनाये जाते थे जिस वजह से उनका रंग वैविध्य सीमित ही था लेकिन स्प्रे कलर के उपयोग के बाद से मानो रंगों की विविधता के क्षेत्र में क्रांति सी हो गयी।

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