सिंदबाद ट्रैवल्स-44इटली-6रोम :- शहर का बस से भ्रमणSindbad Travels-44Italy-6Rome :- City tour by bus

सिंदबाद ट्रैवल्स-44
इटली-6
रोम :- शहर का बस से भ्रमण

Sindbad Travels-44
Italy-6
Rome :- City tour by bus

रोम में मेरा अगला दिन यानी 23 अक्टूबर 1991 मेरी यात्रा के समापन के पास कांदीन था,24 अक्टूबर को इस पहली और लंबी यात्रा से मेरी घर वापिसी होनी थी।23 अक्टूबर को मैंने बस द्वारा रोम का सिटी टूर लेकर घूमने का इरादा किया था।मुझको पता चला था कि रोम के रेलवे स्टेशन रोमा टरमीनी के बाहर  से बस द्वारा डे टूर शुरू होता है तो मैं सुबह ही बस के समय से लगभग आधा घंटा पहले पहुँच गया और रोमा टरमीनी स्टेशन के सामने एक स्थान पर बैठ गया।मेरे पास मेरा कैमरा,वीडियो कैमरा था और मैं कोट-पैंट स्वेटर आदि पहने हुए था।अचानक क्या हुआ कि 8-10 लोगों का एक दल मेरे पास आया और मुझको छू-छू कर मनी,मनी गिव मनी कह कर पैसे मांगने लगा।मैं अपने दोनों हाथ बांधे अपने सामान को ठीक से पकड़े हुए चुपचाप बैठा रहा और उन लोगों ने मुझको चारों तरफ से घेर रखा था।वो तीन चार छोटे छोटे बच्चे थे और कुछ नौजवान लड़के लड़कियां जो कुछ ऐसे ही भटकने वाले हमारे यहाँ जैसे भिखारी पैसे मांगते हैं उनकी किस्म के लेकिन थोड़े बेहतर पहनावे में वो लोग लग रहे थे।जब मैंने उनकी बात पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तो थोड़ी देर बाद वो मेरे सामने थोड़ी दूर पर खड़े व्यक्ति के पास चले गए।उस व्यक्ति को इन लोगों ने घेर लिया और जैसे मुझको छू छू कर बच्चे पैसा मांग रहे थे वैसा ही उसके साथ करने लगे।स्वाभाविक रूप से झल्लाते हुए उस व्यक्ति ने उन बच्चों को दूर भगाने को अपने हाथ हिला कर-उठा कर उनको दूर जाने को कहना शुरू किया और ये घेर कर अपना प्रयास कर रहे हे।मैं इस सब घटनाक्रम को दूर से देख रहा था कि अचानक मैं क्या देखता हूँ कि जब उस व्यक्ति ने अपना हाथ ऊपर उठा तो बड़ी सफाई से उनमें से एक बच्चे ने उसके कोट की सामने अंदर की पॉकेट से उसका पर्स जो दिख रहा था वो निकाल लिया और जब तक कोई कुछ समझे वो वहाँ से चंपत हो गए।तुरंत ही उस व्यक्ति की भी समझ में आ गया कि क्या हुआ है लेकिन तब तक वहाँ कोई नहीं था।मुझको लगा कि जो मैं चुपचाप बैठा रहा बिना हाथ आदि हिलाए डुलाए वो अच्छा ही रहा।
इसी बीच डे टूर वाली बस आ गयी और मैं उस में सवार हो गया तथा अपना टिकट दिखा कर आगे की तरफ ही बैठ गया।यह एक लो फ्लोर वाली शानदार लक्ज़री बस थी और उस समय तक भारत में दिल्ली या कहीं भी हम लोगों ने  बसें कभी नहीं देखी थीं।इस बस के दरवाजे ऑटोमैटिकली अपने आप खुलते-बंद हो जाते थे बस उस समय उनमें से हवा के प्रेशर जैसी एक आवाज जरूर आती थी लेकिन बस थी बहुत शानदार।उसमें सबसे आगे बीच में सूट पहने एक गाइड बैठा था जो हमको हर स्थान के विषय में बस के ऑडियो सिस्टम के माध्यम से बता जा रहा था।स्वाभाविक ही है कि मैंने इटैलियन नहीं अपितु इंग्लिश भाषा वाले गाइड का टूर लिया था।
बस सबसे पहले हमको कोलोजियम ले गयी।यह विश्व के सात आश्चर्यों में से एक है जो रोम शहर में स्थित है।यह असल में एक Amphitheatre है यानी कि बहुत विशाल खुला अखाड़ा या कुछ-कुछ आधुनिक स्टेडियम जैसा लेकिन सचमुच बहुत विशाल जो बाहर की तरफ से गोलाकार कई मेहराबदार दरवाजों वाला बाहर से 3 मंजिला और दूसरी तरफ से 4 मंजिका भी दिखता है।इसके मेहराबों पर सुंदर मूर्तियां बनी हुई हैं।
Colosseum एक अंडाकार या वर्तुलाकार आकृति की बनी विशाल इमारत है जो आधुनिक रोम शहर के बीच में स्थित है।यह विश्व के सर्वाधिक बड़े बने अखाड़ों में माना जाता है जो कभी भी बने।इसका निर्माण रोमन सम्राट वेस्पियन (69-79AD) के समय में शुरू हुआ और उसके वारिस सम्राट टाइट्स के समय में सन 80 ईसवी में यह बन कर तैयार हुआ।इस अखाड़े का नाम फ्लावियन एम्पीथियेटर रखा गया था क्योंकि इसका जुड़ाव फ्लेवियन खानदान के सम्राटों से था।
यह ट्रेवटाइन  चूना पत्थर,टफ यानी ज्वालामुखी की चट्टानों और ईंट जैसी दिखने वाली कंक्रीट से बनाया गया है।इसमें एक बार में 50 हजार से 80 हजार दर्शक बैठ सकते थे।यह उस समय में रोमन साम्राज्य की धाक का प्रतीक था।
यह 189 मीटर या 615 फिट लंबा,156 मीटर या 510 फिट चौड़ा है और इसका आधार 24000 वर्गमीटर के क्षेत्रफल वाला है जो 6 एकड़ में फैला हुआ है।इसकी बाहरी दीवार की ऊंचाई 48 मीटर या 157 फिट है।इसका पैरीमीटर या परिमाप 545 मीटर या 1788 फिट का है और इसमें 80 प्रवेश द्वार थे।इसके द्वारों में कई छेद दिखाई देते हैं जिनमें कभी मजबूती के लिए लोहे की छड़ें लगाई गई थीं लेकिन चोर उच्चक्कों ने समय के साथ उनको नहीं छोड़ा और कई बार तो इसके पत्थरों की चोरी का भी जिक्र सुना है।इसका सम्बन्ध कैथोलिक धर्म से भी है।वर्तमान में ईसाई धर्मगुरू पोप एक मशाल जुलूस "way of the Cross" का नेतृत्व करते हैं जो इसी कोलोजियम के इलाके से शुरू होता है।पहले इस स्थान पर रोम के सम्राट नीरो ने एक झील बनवाई थी और उसके सामने ही नीरो की विशालकाय कांस्य प्रतिमा लगी हुई थी जो उसके आत्महत्या करने के बाद हटवा दी गयी और झील को भरवा कर सम्राट वेस्पियन ने यह एम्पीथियेटर बनवाना शुरू किया।
इस अखाड़े में पुराने युद्धों को ड्रामे के रूप में रच कर प्रस्तुत किया जाता था,जानवरों और मनुष्यों की लड़ाई होती थी,ग्लैडिएटर्स की लड़ाई होती थी और अपराधियों को मृत्यु दंड भी दिया जाता था।जब मैं इस एम्पीथियेटर यानी कोलोसियम के अंदर खड़ा हुआ तो कुछ क्षणों को लगा मानो मैं उस युग में पहुँच गया हूँ,अफ्रीका से लाये गए हजारों जानवरो की लड़ाई का शोर हो रहा है,गैंडे हैं,जिराफ हैं,शेर हैं,मगरमच्छ भी हैं तो दूसरी तरफ ग्लैडिएटर मरने मारने पर उतारू हैं तभी लगता है जैसे महाभारत जैसे युद्ध का मंचन यहाँ हो रहा है तो दूसरी तरफ शायद रामलीला हो तो रावण का अट्टहास गूंजेगा लेकिन वहाँ तो यूरोप के युद्धों का मंचन हो रहा है,मारकाट का शोर है और अपने स्थानों पर बैठे लोग जुनून में शोर मचा रहे हैं,एक साथ 80 हजार आदमी हुंकार भर रहे हैं,शोर मचा रहे हैं कि तभी बस के गाइड ने कहा चलिए अब अगली जगह का समय हो रहा है।
हम लोग बस में बैठ कर आगे बढ़े और रोम की ऐतिहासिक सड़कों पर घूमती हुयी बस अब जिस जगह रुकी उसका नाम था "Altar of the Fatherland.या ALTARE DELLA PATRIA" इसका मूलतः निर्माण एकीकृत इटली के पहले राजा विक्टर इमैनुयल द्वितीय के सम्मान में 1885-1935 के बीच में  हुआ था।यह पिआत्ज़ा वेनीज़िया और कैपिटोलाइन हिल के बीच स्थित है।बाद में चलकर प्रथम विश्व युद्ध में शहीद हुए इटली के सैनिकों के सम्मान को भी इस स्थान से जोड़ा गया।इसका वास्तु नियोक्लासिकल है।यह पुराने रोम के सम्मान और नए रोम से जुड़ाव का प्रतीक स्मारक भी है।यह एक भव्य इमारत है जो लगभग 70 मीटर ऊंची और 135 मीटर फैली तथा 130 मीटर गहरी है।सामने विशाल सीढियां है और दोनों तरफ विशाल आधार जैसी दीवारों पर अति विशाल मूर्तियां लगी हैं।इस पर ऊपर चढ़ कर चारों ओर से रोम का बहुत भव्य दृश्य दिखता है।मुझको यहाँ पर न जाने क्यों इटावा के टिकसी मंदिर की ऊंचाई,भव्यता और छत याद आयी जिस पर से आप यमुना नदी,उसके बीहड़ तथा पूरे इटावा शहर का भव्य दृश्य देख सकते हैं और कुछ उस से मिलता जुलता नजारा फिरोजाबाद के सूफी साहब की ऊपर की मंजिल से भी लेकिन हॉं ये भी बात सत्य है कि रोम के पीछे कई साम्राज्यों और कई सदियों की भव्यता झलकती है जिसका सौंदर्य भी अद्भुत है।
हमारा अगला स्थान था स्पेनिश स्टेप्स।1823 से 1825 के बीच एक फ्रांसीसी डिप्लोमैट की मदद से यह विशाल इमारत बनी जो ट्रिनिटा दे मोंटेनी चर्च और स्पेन के दूतावास को जोड़ती है।यह यूरोप का सबसे चौड़ा जीना (सीढियां) है।बसंत के मौसम में हर वर्ष इन सीढ़ियों को फूलों से सजा दिया जाता है जिसका सौंदर्य अकल्पनीय होता है।हमारे गाइड ने बताया कि यहाँ से फॉण्टाना दे ट्रेवी बिल्कुल पास में ही है।इस इमारत की 138 सीढियां जहाँ से शुरू होती हैं वहाँ भी एक सुंदर फव्वारा Fontana della Barcaccia है।
यहाँ से आगे हमारी बस हमको Caste saint Angelo भी ले गयी।यहाँ मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि यह यात्रा मैंने 1991 में की थी और आज यह संस्मरण इटली वाला मैं सन 2023 में लिख रहा हूँ तो स्थानों के सीकुएन्स में कुछ फेरबदल भी हो सकता है।यह इमारत एक बहुत बड़ा कैसल है जो शुरू में सम्राट हैद्रीयन
ने अपने और अपने परिवारीजनों के मकबरे के लिए बनाया था।बाद में पोप ने इस गोलाकार विशाल इमारत को अपने किले और महल के रूप में उपयोग में लाया था।यहाँ एक म्यूजियम भी है और यह वैटिकन सिटी के बाहर स्थित है।हमारी बस का गाइड बता रहा था कि रोम का बहुत पुराना इतिहास रहा है और सबसे बड़ी बात है कि उन लोगों ने अपने इतिहास को संजो कर,बना संवार कर रखा है।

इसके बाद हमारा अगला डेस्टिनेशन था Piazza Navona.दरअसल जो जर्मन में Platz है,अंग्रेज़ी और फ्रेंच में Place है और हमारी हिंदी में चौक या मैदान जैसा वही इटालियन भाषा में Piazza है।इस पिआत्ज़ा नोवोना पर तीन सुंदर फाउंटेन थे जहाँ बर्नीनी और ब्रोमिनी जैसे अनेकों कलाकारों की कलाकृतियां मूर्तियां आपको पलक नहीं झपकाने देती हैं।यहाँ पर हमने Fontana dei morro और Fontana dei neutono देखे।इस पिआत्ज़ा का निर्माण सन 88 ईसवी के आसपास हुआ था।
इस स्थान के बाद आखिर में हम सत्य का मुख या Mouth of Truth देखने गए।यह मार्बल पत्थर का बना हुआ एक विशालकाय मुँह जैसा है जिसके बारे में किंवदंती है कि कभी इसमें हाथ डालें और उसके मन में झूठ हो तो अंदर उसका हाथ कट जाता था।यह रोम में कौसमेडियन चर्च में सांता मारिया के बरामदे की बायीं ओर की दीवार पर बना हुआ है।कौसमेडियन चर्च the Piazza della Bocca della Verità में स्थित है।वहाँ पर मैंने देखा कि पर्यटकों की बहुत भीड़ थी और लोग उस मुख में अपना हाथ भी डालते थे,मैंने भी डाला और वो सुरक्षित बाहर भी निकल आया।इस चर्च का फर्श बहुत सुंदर मार्बल पत्थर से बना हुआ है और उस पर बहुत खूबसूरत काम हो रहा है।
इसके साथ ही ये बस यात्रा रोम दर्शन की समाप्त हो चुकी थी और मैं रोमा टरमीनी रेलवे स्टेशन के बाहर से टैक्सी पकड़ कर इस्कॉन टेम्पल के गैस्ट हाउस वापिस आ गया था।आज की रात मेरी अपनी इस लंबी यात्रा की आखिरी रात थी।अगले दिन मेरी वापिसी थी अपने वतन के लिए।

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