सिंदबाद ट्रैवल्सफ्रैंकफर्ट फेयर, जर्मनी और ऐतिहासिक कैंडल स्टैंड्स बनाने का किस्सा
सिंदबाद ट्रैवल्स
फ्रैंकफर्ट फेयर, जर्मनी और ऐतिहासिक कैंडल स्टैंड्स बनाने का किस्सा
जब मैं फेयर में अपने सैम्पल लादे हुए घूम-घूम कर ऑर्डर लेने के प्रयास कर रहा था तो मैं क्रिसमस के ऑर्नामेंट्स आदि से भरे एक बहुत सुंदर स्टैंड पर पहुँचा जो बेल्जियम के एक व्यापारी का बूथ था।उसके मालिक से मेरी बात हुई और उन्होंने मुझको चांदी से चमकते हुए कुछ कैंडल स्टैंड दिखाए जो काँच के बने हुए थे।हमारे जैसे फिरोजाबाद के लोगों के लिए ये बिल्कुल नई चीज थी जो न कभी देखी थी न सुनी थी।मिस्टर फ़्लेमा ने पूछा ये बना सकते हो?सही बात ये है कि वो कैंडल स्टैंड बहुत हल्के काँच के बने हुए थे और उनमें हवा ब्लो करने का होल भी बहुत छोटा था किंतु मैंने कहा कोशिश करूंगा तो उन्होंने मेरा पता ले लिया और मुझको लगभग एक दर्जन अलग-अलग डिज़ाइन के पीस फिरोजाबाद भेज दिए।वो चीज हम सभी के लिए बिल्कुल नई थी और उसको बनाने के मैंने बहुत प्रयास किये।अहमदाबाद,हाथरस और न जाने कहाँ-कहाँ के मोल्ड एक्सपर्ट्स से बात की,ट्रायल की पर कई महीनों तक कोई सफलता नहीं मिली।इनको बनाने के लिए फिरोजाबाद के कई जानकारों से मदद भी ली किंतु कोई सफलता नहीं मिली।आखिर एक दिन हार कर मैंने एक मोल्ड वाले से कहा कि क्या भाई हमारे देश में हम लोग ये आइटम नहीं ही बना पाएंगे तो उसने सुझाव दिया कि इसके डाइमेंशन्स में कुछ परिवर्तन किया जाए तो सम्भव है।हमने नए सिरे से तीन साइज़ के मोल्ड बनाये,उस समय लक्ष्मी ग्लास वर्क्स में जो मेरी जापानी पॉट फर्नेस चलती थी उस पर ट्रायल हुए और वास्तव में फिरोजाबाद के कारीगरों को माउथ ब्लोअरों को उस आइटम को बनाने में पसीना आ गया किंतु हमने हिम्मत नहीं हारी हाँलाँकि इस सब में लगभग एक वर्ष लग गया।उस समय हमको मालूम नहीं था कि यह आइटम आगे चलकर फिरोजाबाद ही नहीं बल्कि हिंदुस्तान से काँच के एक्सपोर्ट के इतिहास में एक मील का पत्थर बनने वाला था।
धीरे-धीरे प्रयास करके हमने वो तीन साइज़ तो बना लिए।शुरुआत में यह कैंडल स्टैंड हमने और पूरे एशिया में केवल हमने ही बनाये थे जिनको फिर हम लोगों द्वारा सिल्वर,ब्ल्यू और अम्बर रंगों में बनाया गया जो पोलिश होने के बाद कमाल की चीज़ लगते थे।
बाद में काम बढ़ने पर महेश/अशोक ग्लास वर्क्स जो हमारे करीबी मित्र श्री अरुण जैन की टैंक फर्नेस वाली फैक्ट्री थी उसमें भी इनका उत्पादन जबरदस्त मात्रा में हुआ और बाद में न जाने कितने एक्सपोर्टरों ने ये आइटम बनाये और बेचे।
यहाँ इस किस्से में जो उल्लेखनीय बात है कि हम लोग ओरिजिनल जैसे प्रोडक्ट नहीं बना पाए और ऐसा अनुभव मुझको न जाने कितनी बार हुआ कि टैक्नोलॉजी में 1990 के दशक में हम बहुत पीछे थे और आज भी हम बहुत पीछे हैं। आगे ऐसे और भी किस्से हैं जब बहुत शिद्दत से यह महसूस हुआ कि हमारे यहाँ के स्किल डिवेलपमेंट प्रोग्राम दरअसल व्यवहारिक कम से कम ऐसे उद्योगों के क्षेत्र में तो बिल्कुल नहीं है और यह बहुत अफसोस की बात है। मैं जो फोटोज़ इस आलेख के साथ पोस्ट कर रहा हूँ वो ध्यान से देखिएगा जो पीस हिंदुस्तान में बने हैं उनका नीचे वाला हिस्सा ब्लोइंग में आसानी के लिए खुला हुआ है और वो भारी भी हैं।फोटो में केवल दो पीस हमारे यहाँ के बने हैं (1995/96 में) बाकी सब विदेशी हैं और कम से कम एक शताब्दी पुराने तो हैं ही।
मेरा मानना है कि हमारे पॉलिसी मेकर्स को ऐसी चीजों पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि नौजवानों के लिए अगर सही स्किल ट्रेनिंग और साधनों की व्यवस्था की जाए तो बहुत अच्छे रोजगार के और काफी अच्छी आय के साधन बन सकते हैं।


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