सिंदबाद ट्रैवल्स ब्रसेल्स,बेल्जियम से पेरिस की 300किमी/प्रति घंटा की रफ्तार वाली TGV ट्रेन से यात्रा तथा पेरिस में रात को रास्ता भूलने का किस्सा

सिंदबाद ट्रैवल्स
ब्रसेल्स,बेल्जियम से पेरिस की 300किमी/प्रति घंटा की रफ्तार वाली TGV ट्रेन से यात्रा तथा पेरिस में रात को रास्ता भूलने का किस्सा

व्यापार के लिए मेरी  पेरिस की और भी यात्राएं हुईं लेकिन उल्लेखनीय घटना हुईं सन 2000 की यात्रा में.इस यात्रा में मैं और मेरे एक दोस्त और फिरोजाबाद के निर्यातक श्री प्रवीन जैन साथ साथ थे. हम लोग अपनी यात्रा के (यूरोप)अंतिम चरण में पेरिस आये. पेरिस हम लोग ब्रसेल्स, बेल्जियम होते हुए आये थे और 300 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से चलने वाली TGV ट्रेन से आये थे. ट्रेन में अंदर बैठ कर महसूस ही नहीं हो रहा था कि यह ट्रेन इतनी तेज रफ्तार से चल रही है.एक स्थान पर मैंने एक पत्थर पर या बोर्ड पर लिखा देखा “पेरिस 150 किलोमीटर” मैंने अपनी घड़ी देखी और विश्वास मानिए घड़ी से देख कर सही 30 मिनट में इस शानदार,बेहद आरामदायक ट्रेन ने हमको उस स्थान से,जहाँ पेरिस 150 किमी लिखा था, पेरिस पहुँचा दिया जबकि ट्रेन के अंदर स्पीड इतनी तेज है ये कतई पता नहीं चलता था.पेरिस पहुँच कर हम लोग एयर पोर्ट के पास एक होटल में रुके क्योंकि अगले दिन सुबह प्रवीण की फ्लाइट हिंदुस्तान की और मेरी फ्लाइट वाशिंगटन डीसी,अमेरिका की थी.होटल में सामान रख कर हम दोनों लोग पेरिस शहर में निकल गए और आइफ़िल टावर आदि घूमते रहे.रात होने पर खाना आदि कहा कर हमने शहर से एयरपोर्ट जाने की मेट्रो पकड़ी.मेट्रो में बैठने पर हमको मालूम था कि हमको आखिरी स्टेशन पर उतरना है और रात में हम लोग मेट्रो रुकने पर आखिरी स्टेशन पर ही उतरे पर स्टेशन पर उतरते ही समझ में आ गया कि बहुत बड़ी गड़बड़ हो गयी थी.हुआ ये था कि हम एयरपोर्ट से विपरीत दिशा की मेट्रो में बैठ गए थे यानी कि बैठना एयरपोर्ट जाने वाली में था और बैठ गए थे एयरपोर्ट से आने वाली में.आसानी के लिए समझिए कि दिल्ली में कहीं से एयरपोर्ट जाना था और उस दिशा से आने वाली मेट्रो पकड़ के पहुँच गए नोएडा.लेकिन असली मुसीबत तो अब शुरू हुयी;अपनी गलती पता चलने पर सोचा कि कोई बात नहीं अब वापिसी की मेट्रो पकड़ लेते हैं किंतु रात के शायद 11 बज चुके थे और मेट्रो चलना बन्द हो गया था.अब स्टेशन से बाहर निकले कि चलो टैक्सी कर लेंगे लेकिन लगभग 1-डेढ़ किलोमीटर तक कोई टैक्सी नहीं मिली,सारा इलाका सुनसान और सन्नाटे से भरा तो था ही.एक बार सोचा कि पैदल ही होटल चल दें किन्तु वो कतई व्यवहारिक नहीं था क्योंकि एक तो दूरी बहुत थी शायद 20-30 किलोमीटर और दूसरे रास्ता तो मालूम ही नहीं था.अब तो बड़ा मुसीबत थी कि क्या करें..लगा कि सुबह की फ्लाइट तो छूटना अब तय ही है….

हाँ मोबाइल का जमाना आ चुका था तो सोचा कि होटल फोन कर लें तो जेब से होटल का कार्ड निकाला,जो मैं हमेशा जहाँ रुकता हूँ वहाँ का कार्ड अपनी पॉकिट में अवश्य रखता हूँ,और होटल फोन किया तो होटल वाले ने पूछा कि आप हैं कहाँ बताइये तो हम टैक्सी का कुछ इंतज़ाम करें लेकिन उस अंधेरी रात और अनजान शहर में हमको तो मालूम ही नहीं था कि हम exactly हैं कहाँ.मैंने कहा अभी कोई दिखेगा तो फिर फोन करते हैं.थोड़ी देर भटकने के बाद एक स्थान पर 4-5 नौजवान लड़के खड़े हुए बातें कर रहे थे,हम उनके पास गए,थोड़ी भाषा की समस्या लगी लेकिन फिर उनकी होटल के रिसेप्शन पर बात करायी तो उन लोगों ने होटल वाले को बताया कि वो जगह क्या थी,फिर होटल वाले ने कहा कि उसने टैक्सी वाले से बात कर ली है और हम वहीं रुकें,10 से 15 मिनट में टैक्सी वहीं पहुँच जाएगी और ऐसा ही हुआ.जब टैक्सी आ गयी तब हमारी जान में जान आयी और हम आखिरकार अपने होटल पहुँच गए और सुबह मैं अपनी अमेरिका की फ्लाइट में बैठ कर वाशिंगटन को रवाना हो लिया

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